बिहार का बत्तीसगामा: जो दहेज ले, उसे समाज-निकाला

बिहार का बत्तीसगामा: जो दहेज ले, उसे समाज-निकाला 


दहेज बुरी बात है, इसे लेना और देना, दोनों ही खराब है। पर यह आज के समाज का सच भी है। खास कर, बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश में। शहर हो या हो गाँव, बिना दहेज के शादी होना एक अजूबा ही समझिए। क्या अनपढ़ और क्या अतिशिक्षित, क्या गरीब, और क्या अमीर, क्या तथाकथित उच्च तबका, या फिर कोई और, सब के सब इस सामाजिक बुराई में बराबर साझेदार हैं। जैसा दूल्हा, वैसा दहेज। जो जितना दहेज ले पाये, उसे उतना ही श्रेष्ठ मानता है ये समाज।

ऐसे में, इस देश में एक ऐसा  भी समाज है, जहाँ दहेज लेना-देना गुनाह माना जाता है और ऐसा करने पर समाज से अलग कर दिये जाने की परंपरा है। और ये परंपरा काफी पहले से चलती आ रही है और अब भी चल रही है। आश्चर्य ये है कि यह समाज कहीं और नहीं, बल्कि बिहार की ही धरती पर है। इसे बत्तीसगामा समाज कहते है। यह 32 गावों का एक संगठन है और यह बिहार के मधुबनी एवं दरभंगा जिले में सक्रिय है। सालों से यहाँ दहेज न लेने की परंपरा चली आ रही है। अगर कोई यह परंपरा तोड़ता है, तो उसे समाज से निकाल दिया जाता है। फिर उस परिवार से समाज का कोई भी सदस्य न तो कोई रिश्ता करता है और न ही कोई उसके यहाँ भोज में हिस्सा लेता है।

इस परंपरा कि नींव दरभंगा के महाराज ने रखी थी। करीब 800 साल पहले महाराज हरी सिंह ने समाज में बराबरी बनाने और भेदभाव मिटाने के लिए इस परंपरा कि शुरुआत की थी। तब से ये परंपरा अभी भी जिंदा है। काश ये परंपरा बिहार तथा देश के अन्य हिस्सों में भी फैलता, जहां दहेज का डंक न जाने कितनी ललनाओं तथा कितने परिवारों को डंस चुका है और डँसता ही रहता है...

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